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आष्टा। जैन धर्म में हमेशा मानवता और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया जाता है। यह भी साधु संत उपदेश देते हैं कि अगर आप मंदिर जा रहे हैं और रास्ते में कोई बीमार या तड़पता हुआ नजर आए तो उसकी सेवा करना प्रथम कर्तव्य रखें। भगवान के दर्शन और अभिषेक से बड़ा पुण्य उस व्यक्ति को सहायता पहुंचाने में मिलेगा।

इसी बात को आष्टा से मंगल विहार कर सीहोर तरफ जा रही आचार्य विराग सागर मुनिराज की परम प्रभाविका शिष्या गणिनी आर्यिका विंध्यश्री माता जी ने ससंघ ने चरितार्थ कर दिखाई।

एक नव दम्पत्ति के साथ बाइक पर जा रहे वृद्ध को अटैक आने पर तत्काल उन्होंने न केवल णमोकार महामंत्र सुनाया अपितु साथ चल रहे श्रावकों से कहकर उक्त वृद्ध की छाती को दबाकर पिच्छिका से आशीर्वाद देकर जान बचाई।
आचार्य विराग सागर जी महामुनिराज की सुयोग्य शिष्या

परम पूज्य गणिनी आर्यिका 105 विंध्य श्री माताजी का ससंघ आष्टा से सीहोर मंगल विहार करते समय समीपवर्ती बेदाखेड़ी ग्राम पहुंची, तभी एक अनोखी घटना घटित हुई। रास्ते में एक बाइक पर युवा नवविवाहित जोड़ा और पीछे एक वयोवृद्ध दादाजी थे,

दादाजी को अचानक चलती गाड़ी पर अटेक आया जों कि गाड़ी से गिरने को थे इस दौरान पीछे चल रहे माताजी के संघ ने उन्हें देखा और तत्काल सहायता के लिए आगे आए। आष्टा दिगंबर जैन पंचायत कमेटी के कोषाध्यक्ष निर्मल कुमार जैन (कोठरी) और ललित जैन धामंदा व साथियों ने बाइक के पीछे दौड़ लगाकर दादाजी को उतारा और उन्हें नीचे लिटाकर सभी संभव प्रयास किए।

आर्यिका विंध्यश्री माताजी ने उन्हें णमोकार महामंत्र सुनाया और अपना आशीर्वाद दिया। इस हृदय करुणा और माताजी के आशीर्वाद से दादाजी को हृदयघात का सामना करने में मदद मिली और वे सकुशल हॉस्पिटल पहुँच गए।

उन्होंने आर्यिका संघ का धन्यवाद और माताजी का आशीर्वाद लिया।इस घटना ने एक बार फिर जैन धर्म की मानवता और करुणा की भावना को प्रदर्शित किया है। माताजी के मंगल विहार में यह अद्भुत उदाहरण सभी के लिए प्रेरणादायक है।

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