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आष्टा । नगर में आयोजित सात दिवसीय माँ नर्मदा चिंतन सप्ताह ज्ञान यज्ञ के तृतीय दिवस पर भक्तों को आध्यात्मिक गहराइयों में ले जाने वाला दिव्य प्रसंग प्रस्तुत किया गया। इस विशेष दिवस पर माँ नर्मदा मैया के प्राकट्य एवं अवधूत सिद्ध महायोगी श्री दादा गुरु भगवान जी के अलौकिक जीवन प्रसंगों का चिंतन हुआ।


इस अवसर पर श्री दादा गुरु जी के कृपा पात्र, नर्मदा एवं प्राकृतिक उपासक आचार्य श्री रविकांत जी शास्त्री ने
मां नर्मदा के चरण कमलों में वंदन करते हुए कहा प्रातः स्मरणीय आराध्य गुरु के श्री चरणों में समर्पित तृतीय दिवस की पवन कथा में बताया कि भगवती नर्मदा की इतनी दया करुणा जिस बालक को सिर्फ 5 दिन की आयु दी थी उसे आदिशक्ति मां नर्मदा ने चिरंजीव बना दिया।

महाभारत में पांडवों ने प्रत्येक कल्पों में माइ का दर्शन किया। प्रलय और महाप्रलय में किसका कोई अंत न हो उसका नाम नर्मदा है। उपचार और उपहार दोनों यहीं पर मिलते हे।
माता अनुसुइया एवं अत्री ऋषि का प्रसंग सुनते हुए गुरुदेव ने

बताया दोनों माता नर्मदा जी का भ्रमण कर रहे थे तभी माता अनुसुइया को पुत्र प्राप्ति के विषय में स्मरण हुआ तो ऋषि अत्री से माता ने पूछा ऐसा कौनसा तप हे जिससे संतान प्राप्त हो जाए।


ऋषि बोले जगत जननी मां नर्मदा की तपस्या की जाए दोनों नर्मदा तट पर भ्रमण करने लगे अब प्रश्न यह था कि ब्रह्मा,विष्णु,महेश किसका तप करें। तो निश्चय किया कि तीनों का ही तप करे ।
तपस्या और त्रिदेवों का परीक्षण:
मां अनुसूया महान तपस्विनी थीं और पतिव्रता धर्म की मूर्ति मानी जाती थीं।

उनकी ख्याति इतनी फैल गई कि त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने उनकी पतिव्रता शक्ति की परीक्षा लेने का निश्चय किया।
त्रिदेव एक दिन ब्राह्मण रूप में अनुसूया के आश्रम पहुंचे और भिक्षा मांगी, पर एक शर्त के साथ:
“आप नग्न अवस्था में हमें भिक्षा दें।”

  1. अनुसूया की शक्ति और बुद्धि:
    मां अनुसूया संकट में पड़ीं, पर उन्होंने अपनी सत्यनिष्ठा और तपोबल से उन तीनों देवों को नवजात शिशु में परिवर्तित कर दिया और फिर उन्हें स्तनपान कराकर भिक्षा दी।
  2. त्रिदेवों की प्रसन्नता:
    जब त्रिदेवों की पत्नियों (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) को यह ज्ञात हुआ, तो वे अनुसूया से अपने पतियों को मुक्त करने की विनती करने आईं।
    मां अनुसूया ने उन शिशुओं को पूर्व रूप में लौटाया।
    नर्मदा को “स्वयं चलित गंगा” कहा गया है क्योंकि इसकी धारा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है, जो धार्मिक रूप से विशेष मानी जाती है।
    नर्मदा परिक्रमा की परंपरा आज भी जीवित है, जिसमें श्रद्धालु तीन साल, तीन महीने और तेरह दिन में पूरा चक्र पूरा करते हैं।
    आचार्य श्री ने यह भी कहा कि दादा गुरु जी न केवल योगी हैं बल्कि नर्मदा के माध्यम से प्रकृति, चेतना और ब्रह्म की एकरूपता का संदेश देने वाले महान सिद्ध है । उनका जीवन आज भी साधकों को एक नई दिशा देता है।
    कार्यक्रम में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। पंडाल में वैदिक मंत्रों की गूंज, नर्मदा अष्टक व स्तुति पाठ तथा प्रवचन से पूरा वातावरण आध्यात्मिक रस में सराबोर रहा।
    नर्मदा मैया की जयघोष और दादा गुरु जी के नाम की ध्वनि से नगर का वातावरण भक्तिमय बना हुआ है

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