आष्टा। पन्यास प्रवर यशोजीत विजय महाराज ने आष्टा तीर्थ श्री नेमिनाथ श्वेतांबर जैन मंदिर किला के उपाश्रय में आत्मज्ञान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बाहरी संसार को जानना नहीं, बल्कि स्वयं अपने आत्मस्वरूप को पहचानना है। आत्मा की सही पहचान ही आध्यात्मिक उन्नति का प्रथम सोपान है। आत्मा को जाने बिना न सम्यक्त्व की प्राप्ति संभव है और न ही मोक्ष के मार्ग पर सच्चे अर्थों में आगे बढ़ा जा सकता है। भगवान नेमिनाथ जी के जन्म कल्याणक के दूसरे दिन संयम उपकरण छाप का वरघोडा किला मंदिर से किले पर ही निकाला।

तत्पश्चात् आशिष वचन देते हुए यशोजीत विजय
महाराजश्री ने कहा कि आत्मा और कर्म के संबंध को समझने के लिए चार प्रमुख लक्षणों को जानना आवश्यक है। पहला, आत्मा कर्म का कर्ता है। दूसरा, आत्मा अपने द्वारा किए गए पुण्य-पाप रूप कर्मों के फल का भोक्ता है। तीसरा, आत्मा एक गति से दूसरी गति में भ्रमण करता हुआ संसार में भटकता रहता है। और चौथा, आत्मा कर्मों के संयोग तथा भव-भ्रमण से पूर्णतः मुक्त होकर निर्वाण पद को प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने कहा कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप के संबंध में गलत मान्यता ही मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के छह प्रमुख स्थान हैं। जब व्यक्ति यह मानता है कि आत्मा है ही नहीं, आत्मा नित्य नहीं है, आत्मा कर्म नहीं करती, आत्मा कर्मों के फल को भोगती नहीं, आत्मा का मोक्ष नहीं है और आत्मा के मोक्ष का कोई उपाय नहीं है, तब वह मिथ्यात्व की अवस्था में होता है।
इसके विपरीत सम्यक्त्व में इन छह बातों की सही श्रद्धा होती है। आत्मा है, आत्मा नित्य है, आत्मा कर्म करती है, आत्मा कर्मों के फल को भोगती है, आत्मा का मोक्ष संभव है और आत्मा के मोक्ष का उपाय भी है।

यही सही दृष्टि मनुष्य को संसार से मोक्ष की दिशा में ले जाती है। यशोजीत विजय महाराजश्री ने समझाया कि आत्मा की उन्नति के लिए सबसे पहले आत्मा को पहचानना आवश्यक है। आत्मा के संबंध में गलत पहचान मिथ्यात्व है, जबकि आत्मा की सच्ची पहचान सम्यक्त्व है। इसलिए साधक को यह विचार करना चाहिए कि मैं वास्तव में कौन हूं? क्या मैं यह शरीर हूं अथवा शरीर से भिन्न चेतन आत्मा हूं? जब यह भेदज्ञान जागृत होता है, तभी जीवन की दिशा बदलती है। उन्होंने कहा कि आत्मा के स्वरूप को समझना केवल सुनने या पढ़ने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जीवन में उसके प्रति श्रद्धा और आचरण भी होना चाहिए।

मिथ्यात्व के छह स्थानों को छोड़ना है तथा सम्यक्त्व के छह स्थानों को प्राप्त कर उन्हें जीवन में धारण और पालन करना है।महाराजश्री ने कहा कि संसार में जीव अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटक रहा है। संसार के इन अनंत दुखों से मुक्त होकर अनंत सुखमय मोक्ष की प्राप्ति के लिए आत्मा की सही पहचान और मोक्ष की तीव्र अभिलाषा अर्थात् मोक्ष की लालसा जागृत करना अत्यंत आवश्यक है।उन्होंने दुर्लभ मनुष्य जन्म की महत्ता बताते हुए कहा कि मनुष्य भव केवल संसार के भोग-विलास में गंवाने के लिए नहीं मिला है। यह भव आत्मकल्याण और मोक्ष की साधना के लिए मिला है। जिस प्रकार कोई दुर्लभ वस्तु प्राप्त होने पर उसका सदुपयोग करता है, उसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को सफल बनाने के लिए आत्मज्ञान प्राप्त कर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र—इन रत्नत्रय की साधना करनी चाहिए।

पन्यास प्रवर यशोजित विजय महाराज ने कहा कि जीवन का वास्तविक लक्ष्य संसार में अधिक से अधिक सुख-सुविधाएं जुटाना नहीं, बल्कि आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाना है। आत्मा की पहचान से सम्यक्त्व का जन्म होता है, सम्यक्त्व से सही ज्ञान प्राप्त होता है और सही ज्ञान के साथ संयम एवं साधना के मार्ग पर चलकर जीव मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है। उन्होंने आह्वान किया कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर यह भावना जागृत करे कि “मुझे अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को पहचानना है, मिथ्यात्व को छोड़ना है, सम्यक्त्व को धारण करना है और इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को मोक्षमार्ग की साधना द्वारा सार्थक बनाना है।” यही आत्मकल्याण का सच्चा मार्ग है।जिसके लाभार्थी सचिन कोठारी परिवार एवं मयंक सिंगी परिवार ने लाभ लिया।

“सांदीपनि विद्यालय में नवागत शिक्षकों के लिए हुआ ओरिएंटेशन कार्यक्रम
सकारात्मक सोच के साथ करें शिक्षा का पुनीत कार्य – प्राचार्य”
नगर के सांदीपनि (सी.एम. राइज़) शासकीय उमावि आष्टा में नवागत उच्च माध्यमिक शिक्षक, माध्यमिक शिक्षक, प्राथमिक शिक्षक एवं अतिथि शिक्षकों के लिए ओरिंएटेशन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इन शिक्षकों द्वारा जुलाई एवं अगस्त 2026 में विद्यालय में कार्यभार ग्रहण किया गया है। सर्वप्रथम प्राचार्य सितवत खान ने समस्त नवागत शिक्षकों का स्वागत किया और कहा कि हमें सकारात्मक सोच के साथ शिक्षा का पुनीत कार्य करना है। शिक्षक केवल एक बच्चें को पढ़ाता ही नही है, बल्कि पीढ़ियों का निर्माण करता है। हम सबकों शिक्षक होने पर गर्व होना चाहिए और शिक्षा के माध्यम से ही हम समाज को नई दिशा दे सकते है।

प्राचार्य ने नवागत शिक्षकों से आव्हान किया कि अपनी ऊर्जा और ज्ञान का सदुपयोग करते हुए सांदीपनि विद्यालय को नई ऊंचाइयों तक ले जाएं। अकादमिक समन्वयक अंत्येश धारवां ने कहा कि हमें अनुशासन का पालन करते हुए कार्य करना चाहिए। काउंसलर सम्राट ढोके ने नवागत शिक्षकों से कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में अपार संभावना है और विद्यार्थियों को प्रेरित कर हम उनका उज्जवल भविष्य बना सकते है। अंग्रेजी के वरिष्ठ शिक्षक भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि वरिष्ठ और अनुभवी शिक्षकों के अनुभवों का लाभ लेकर नए शिक्षक अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर सकते है।


रसायन शास्त्र के वरिष्ठ शिक्षक जितेन्द्र मेवाड़े ने कहा कि वर्तमान युग प्रतियोगिता का युग है। इसलिए शिक्षकों को नई-नई तकनीकों का उपयोग करते हुए अपने क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करना चाहिए। जीवविज्ञान की वरिष्ठ शिक्षिका पदमा परमार ने ओरिएंटेशन कार्यक्रम में नवागत शिक्षकों को सलाह दी कि कक्षा में पहुंचने से पहले अपने विषय का भली भांति अध्ययन करें और टेक्नाॅलाजी का उपयोग करके अध्यापन को न केवल रूचिकर बल्कि फलदायी भी बनाया जा सकता है।


अंत में प्राचार्य सितवत खान ने समस्त नवागत शिक्षकों को प्रेरित करते हुए कहा कि अभी आपके कॅरियर की शुरूआत है और यदि आप मेहनत करते हुए अध्यापन करेंगें तो निश्चित तोर पर न केवल आप बहुत आगे बढ़ेंगे बल्कि आपकों आत्मीय संतोष भी प्राप्त होगा। ओरिएंटेशन कार्यक्रम में नवागत शिक्षकों पूजा सिलोरिया, अंतिम मालवीय, कामिनी राठौर, मोनिका चैकसे, अतुल आर्य, सत्येन्द्र चैहान, सिफत खान, यतेन्द्र कुमार शर्मा, स्नेहलता पाल, तुलसीराम सरखंडे, विनोद पवार, दीपिका दास, तनिष्क चन्द्रवंशी, राम सिंह वर्मा, राजेन्द्र मालवीय, महेश कुमार वर्मा, रजनी सोलंकी, लोकेन्द्र पैरवाल, हेमलता व्यास, ललिता राठौर, विवके कुमार अहिरवार, निधि पुरोहित, राजकुमारी संकत, प्रदीप राठौर,

संगीता, राजू, कविता मेवाड़ा, साहिबा खान, रीतिका चैहान, नरेन्द्र सिंह ठाकुर, सुषमा कंकरायणें, राधा शर्मा, विशाल परमार, अजीम अंसारी, शोएब अली, राहुल परमार, अखलेश राय ने सहभागिता करी और कहा कि इस संक्षिप्त ओरिएंटेशन कार्यक्रम से उनकों नई ऊर्जा मिली है और प्राचार्य एवं वरिष्ठ शिक्षकों द्वारा जो कार्य सौंपा जाएंगा उसे पूरी तन्मयता के साथ करेंगे और सांदीपनि विद्यालय आष्टा न केवल अकादमिक क्षेत्र में बल्कि खेलकूद, सांस्कृतिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक आदि क्षेत्रों में भी प्रगति करेंगा।
























