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आष्टा । नगर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिवस संत श्री गोविंद जाने के अमृत वचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन पहुंचे। कथा के दौरान गुरुदेव ने पुण्य, धर्म और गृहस्थ जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।


संत श्री ने कहा कि जब व्यक्ति के पुण्य कमजोर होने लगते हैं, तब घर में कलयुग का प्रवेश होने लगता है। इसके परिणामस्वरूप धीरे-धीरे बीमारी, अविश्वास, चिंता और बेचैनी घर में स्थान बना लेती है। उन्होंने कहा कि जिस दिन व्यक्ति अपने घर को मंदिर बना लेता है, उस दिन श्रीकृष्ण नाम के आशीर्वाद की औषधि स्वयं उसके घर में प्रवेश कर जाती है। जो कार्य धन और संपत्ति नहीं कर पाते, वे कार्य विपत्ति में गौ माता की दुहाई और सद्गुरु का आशीर्वाद कर देता है।


गुरुदेव ने बताया कि यदि स्वप्न में गौ माता बछड़े को दूध पिलाती दिखाई दें या मंदिर में आरती होती नजर आए, तो यह भगवान की विशेष कृपा का संकेत है। उन्होंने कहा कि विषम परिस्थितियों से सुरक्षित निकल पाना धर्मपत्नी के पल्लू, चूड़ा और मांग के सिंदूर के पुण्य का फल होता है।


संत श्री ने कहा कि घर की पहचान धन से नहीं, बल्कि तुलसी क्यारे, आंगन में गौ माता और सात्विक खान-पान से होती है। बुरे विचार आने पर मन को नियंत्रित कर पीछे हट जाना ही सच्चा धर्म है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भाई-भाई या पड़ोसी-मोहल्ले में कपट होगा, तो मंदिर जाने का कोई लाभ नहीं होगा। प्रेम और निष्ठा से रहने पर ही भगवान प्रार्थनाएं स्वीकार करते हैं।


उन्होंने बताया कि माता-पिता के क्रियाकर्म, मंदिर निर्माण, कथा पंडाल, भंडारा और दिन-दुखियों की सेवा—इन पांच स्थानों पर किया गया दान-दक्षिणा भगवान स्वयं उतारते हैं। जब घर में पुण्य बढ़ता है तो भगवान पहले किसी संत या महात्मा को मार्गदर्शन के लिए भेजते हैं। जब पुण्य बढ़ता है तो अग्नि, जल, ग्रंथ और तुलसी स्वयं भगवान से आपके लिए गारंटी लेने लगते हैं। जीवन के अंतिम समय से पहले यदि व्यक्ति धन और धर्म के कार्यों में लग जाता है, तो उसका जीवन-यज्ञ सफल हो जाता है।

जहां दान, पुण्य और देने की प्रवृत्ति प्रकट होने लगती है, वहां चित्रकूट बनने लगता है।
इस अवसर पर नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि राय सिंह मेवाड़ा, समिति अध्यक्ष रूपेश राठौर, डॉ. मीना सिंगी, संयोजक डॉ. मनोज नागर,नानूराम मेवाडा सहित सैकड़ो श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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