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गुरु है क्या? शास्त्रों में गुरु की महिमा का अपार वर्णन है।भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपने गुरु के कहने पर उनके दिवंगत पुत्र को लाकर उन्हें गुरु दक्षिणा के रूप में सौंपा था ।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम ।
गुरु-गु +रु
गु का अर्थ है अंधकार
रु का अर्थ है दूर करने वाला
अर्थात् अंधकार दूर करने वाला।अंधकार अज्ञान का सूचक है, भय का सूचक है,भ्रम का सूचक है।इस अज्ञान,भय और भ्रम का छेदन करने वाला गुरु है ।जन्म से मृत्यु तक मानव किसी न किसी से कुछ न कुछ सीखता ही रहता है ।माँ हमारी प्रथम गुरु होती है ।

हम पिता से भी उनके साथ तक जीवन जीने की कला सीखते रहते हैं ।इस प्रकार माता पिता दोनों हमारे प्रारंभिक गुरु हुए।फिर प्राथमिक विद्यालय से लेकर अंतिम शिक्षण संस्थान तक जीवन में कई गुरु मिलते हैं ।फिर अन्य गुरु,दीक्षा गुरु आदि आदि।अर्थात् अंतिम साँस तक किसी न किसी से कुछ न कुछ सीखते रहते हैं ।ये सब भी हमारे गुरु ही होते हैं ।भगवान दत्तात्रेय ने अपने जीवन काल में 24 गुरु बनाये थे।इनमें कुछ ऐसे थे जिनके बारे में हम मात्र आश्चर्य कर सकते हैं कि इनसे उन्होंने क्या सीखा होगा।पर सबमें कोई न गुण होता है जिसे हम ग्रहण कर सकते हैं ।
उनके 24 गुरुओं में कबूतर, पृथ्वी, सूर्य, पिंगला, वायु, मृग, समुद्र, पतंगा, हाथी, आकाश, जल, मधुमक्खी, मछली, बालक, कुरर पक्षी, अग्नि, चंद्रमा, कुमारी कन्या, सर्प, तीर (बाण) बनाने वाला, मकडी़, भृंगी, अजगर और भौंरा (भ्रमर) हैं।
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काको लागूं पाय
बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय।
इसकी विद्वानों ने अलग अलग व्याख्या की है ।इसका सीधा सा अर्थ है कि गुरु की कृपा है कि गोविंद को पहचानने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।


आजकल स्वयम्भू गुरुओं की बाढ़ सी आई हुई है ।हजारो लोगों को एक साथ दीक्षा दी जाती है ।तथाकथित गुरु लोग व्यक्ति पूजा में लगे हैं और सांसारिक सुखों की चाह में सामान्य व्यक्तियों की तरह व्यवहार कर रहे हैं ।यदि वास्तविक गुरु न मिल रहे हों तो आदि गुरु भगवान श्री कृष्ण को अपना गुरु बना लें ।
अंत में एक निवेदन करना चाहूँगा कि गुरु की खोज में किसी गुरु घंटाल के जाल में मत फंसियेगा ।

पं डॉ दीपेश पाठक नगरपुरोहित की कलम से….

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