आष्टा । साहब ये आष्टा है,ओर आष्टा में जो हो जाये वो कम है,जो कही नही होता है,वो आष्टा में हो जाता है,ओर जो आष्टा में होता है,वो मजाल है कही और हो जाये,क्योकि ये आष्टा है । यही कारण है आष्टा में जो भी अधिकारी आया,अपनी सेवा देकर गये,भले ही वो सेवा काल मे मेवा खा कर गये हो,लेकिन आज जब उनको आष्टा जैसा मेवा नही मिलता है तब वे गम मिटा मिटा कर आष्टा को याद करते है,क्यो..क्योकि साहब ये आष्टा है ।

यहा घर का जोगी जोगड़ा ओर बहार का सिध्द वाली कहावत पूरी तरह सिद्ध होती है । अब देखो ना पाडे पाडे लड़े,पाड़ो की लड़ाई में बागड़ का नुकसान होना चाहिये था, लेकिन पाड़ो की लड़ाई में भी बागड़ ने “आपदा में अवसर” को खोज लिया और बागड़ ने नुकसान के बदले 20 से 22 हजार का लाभ प्राप्त कर पाड़ो की लड़ाई में नुकसान के बदले 20/22 हजार का लाभ प्राप्त कर नुकसान होने के बदले फायदा ले कर एक इतिहास रच दिया ।

अब पाडे चौक में लड़े या चौराहे पर लड़ाई तो लड़ाई होती है । जब लड़ाई हो ही गई तो फिर समझौता किस बात का । लेकिन कहते है जब तक ……जिंदा है-तो अकलमंद भूखे नही मर सकता क्योंकि उसे आपदा में अवसर पाने का सिस्टम याद है । अब एक ओर बड़ा प्रश्न ये सुखी नदी में तैर रहा है की भैय्या शहर में ये पाडे आये कहा से,पाडे लड़ क्यो रहे है,पाड़ो की पाड़ो से ही दुश्मनी क्यो..? तो भैय्या आपने सुना होगा की जब दाढ़ में हराम का खून लग जाता है,तब बार बार जिबान दाढ़ की ओर ही जाती है ।

ये घुंघरू जो बजते नही..पर सुनाई जरूर देते है……
अब यहा पाड़ो की किस्म ओर उनकी तासीर की बात हो जाये । पहले पाड़ो की किस्म की बात हो जाये तो आज इस काल मे पाडे बड़े ही बेहया,बेगैरत,बेईमान ऐहसान फरामोश किस्म के हो गये है । कहते है जब पाड़ो को शुरुआत में ही हराम की पकी पकाई खाने को मिल गई तब से ही उसकी आदत बिगड़ गई बस उसे ईमानदारी का चोला ओढ़ कर हराम की खाने की आदत पड़ गई और यही हराम की खाने की आदत के कारण जब वो चौक चौराहों पर मुह मारते है, लड़ते है,जनता उनेह दूर करने के लिये कितने ही लठ्ठ ठपकाये या पानी फेके वो किसी की नही सुनते,किसी से नही डरते ओर किसी की नही मानते है बस उनेह तो सामने वाले पाडे की मट्टी पलित करना होता है ।

एक पाडे की किस्म ऐसी भी होती है जिसे ज्यादा चर्बी चढ़ जाती है,ज्यादा गर्मी भरा जाती है । ऐसे पाड़ो की गर्मी निकालने ओर चर्बी कम करने के लिये भी पाडे पाडे भीड़ जाते है,और बस कही बागड़ का नुकसान हो जाता है तो कही आपदा में अवसर निकाल लिये जाते है । अब आप सोच रहे है की आखिर हम कौन से पाड़ो की बात कर रहे है तो इसमें ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नही है क्योंकि पाडे भी आपके सामने है,आप सब आष्टा के है,आष्टा वालो को पूरी खोल कर बताने की जरूरत नही होती है,वो तो लिफाफा देख कर ही सब कुछ समझ लेते है और पाड़ो की लड़ाई भी आये दिन आप सब देखते है,पढ़ते है,ओर सोशल मीडिया के इस युग मे कई प्लेटफार्म पर आप वीडियो के माध्यम से भी देखते है,ओर देखना भी चाहिये क्योंकि देखने के बाद ही तो जनता तय करती है कि आखिर ये पाडे लड़े क्यो थे..?

एक गाय ने हमे ऐसे ही ज्ञान दे दिया,भाई साहब आप ज्यादा दिमाग मत लगाओ जिस पाडे की जैसी आदत बन जाती है,तो वो अपनी आदत से बाज नही आयेगा । क्योकि जब सब पाडे ऐसे ही एकत्रित हो जाते है तो वो कमजोर पाडे पर चढ़ाई करने में देर नही करते है । मरता क्या नी करता है।
अब हम तो उस बागड़ की तलाश में है जिसने पाड़ो की लड़ाई में भी नुकसान की जगह लाभ प्राप्त कर एक इतिहास रच दिया ये बागड़ ने कैसे किया बस उस तकनीक का मूलमंत्र मिल जाये तो हम भी बागड़ बन जाये……..!

























