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आष्टा।इस संसार में व्यक्ति की भूख – प्यास कभी मिटने वाली नहीं है, विशेष कर धन – सम्पत्ति की। कलयुग हो या सतयुग हो पुण्य है जब तक सब कुछ अच्छा होगा। भगवान अभिनंदन जी ने सब इन्द्रियों को जीत लिया।सुख प्राप्त करने में लगे हो,छुदा रोग का नाश करने का प्रयास करें।

संकल्प लेकर त्याग करें। आजकल कोई भी खाद्य पदार्थ शुद्ध नहीं, हमारी रोटी से तो मवेशियों का चारा शुद्ध है । स्वर्ग एवं भोग भूमि में उम्र बहुत है, लेकिन त्याग की भावना फिर भी नहीं हो रही है।भव सुधारना है तो भाव सुधारें । पापों, व्यसनों से दूर रहें । परलोक बिगड़ेगा यह विचार रहेगा तो व्यक्ति पाप नहीं करेगा।


उक्त बातें नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर विराजित मुनि भूतबलि सागर महाराज एवं मुनि सागर महाराज ने आशीष वचन देते हुए कहीं। मुनि सागर महाराज ने कहा पापी लोग भी पाप करने से पहले सोचते हैं।वे रात में पाप करते हैं। गुरु के सत्संग के बाद उपादान में जागृति आना चाहिए।राम के स्थान पर भरत को राजगद्दी सौंपना चाही तो उन्होंने मना किया, लेकिन मजबूरी में उन्होंने राजगद्दी संभाली।राम के वनवास से आते ही उन्होंने राजगद्दी छोड़ दी। पहले के जमाने में ऐसे भाई थे,आज क्या स्थिति है किसी से छुपी नहीं है। जितनी तृष्णा बढ़ेगी, उतना ही भोग बढ़ेगा। अहिंसा परमो धर्म को स्वीकार करें।मन के हारे हार,मन के जीते जीत।

भारत के प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करते हैं। उनके जितना काम आप नही कर सकते हैं।इस लिए व्यक्ति को सेवक बनकर रहना चाहिए, मालिक नहीं बनें। पंच इंद्रियों के गुलाम न हो। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी भारत को नहीं समझ पाए,आज भी अंग्रेजों के अनुसार चल रहे हैं। भगवान से राग नहीं, भक्तों के गुण नहीं देख रहे। लोगों के दुर्गुणों को देख रहे हैं। राग द्वेष से बचने का प्रयास करें। पूजा -पाठ का आनंद नहीं ले पा रहे हैं। भगवान ने जो कहा है उसे माने, तभी कल्याण होगा। आप लोगों का जीवन पवित्र और पावन हो।

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