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बहुत दिनों बाद एक बड़ा ही रोचक वाकिया चर्चा में बना हुआ है। मामला बड़ा रोचक तो लगा ही,साथ ही सोच रहा हु की क्या एक जिम्मेदार होने के नाते बड़ी जिम्मेदारी से युक्त है,जहां वो बैठे है,उसके बदले उसे हजारों का नही बल्कि लाखो में वार्षिक वेतन मिलता होगा(नोट इसमें ऊपर की कमाई शामिल नही है)

उसके बाद भी अगर ऐसा जिम्मेदार जब अपने घर मे कोई शुभ कार्य आये और उस शुभ कार्य को सम्पन्न करने के लिये अपनी जेब मे हाथ नही डालते हुए उन लोगो पर दवाब डालने के प्रयासों ने जुटता हो जिनके बीच वो नोकरी करता हो तो बताये इससे घटिया,निम्न स्तर, क्या हो सकता है…। जब ये किस्सा सुना तो सोचा क्यो ना इसको “ये घुंघरू जो बजते नही,पर सुनाई तो देते है में स्थान दिया जाये.!

सूत्रों के हवाले से ऐसा ही एक बकाया हमारे तक पहुचा जब सुना की कुछ माह पूर्व पदस्थ एक जिम्मेदार के यह एक शुभ प्रसंग उपस्तिथ हुआ ,इस शुभ प्रसंग को सम्पन्न कराने में बड़ा खर्चा भी था,जिस जिम्मेदार के यहा ये प्रसंग उपस्तिथ हुआ था उसको बिना मेहनत की खाने की,अवैध बसूली बसूलने की आदत उसकी रग रग में बसी है ।

ये आदत उसे यही पड़ी हो ऐसा नही है,ये गंदी आदत उनके साथ ही आई है। उसने सोचा में जिम्मेदार हु जेब से क्यो खर्चा करु । बस उसने उन लोगो से जो उक्त जिम्मेदार की छत्र छाया में काम करते है,जैसे तैसे उसके कार्य क्षेत्र में कार्य करते है,के संगठन के प्रमुख पर दबाव बनाया की मेरे यहा शुभ प्रसंग है,मुझे इतने लाख ₹ की सहायता करो।

ये घुंघरू जो बजते नही,पर सुनाई देते है…..

ये सुन संगठन के प्रमुख का चेहरा फक्क पड़ गया। लेकिन दबंग संगठन के प्रमुख ने उक्त सेवा करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। और सही भी है संगठन का प्रमुख को आपके यह आये शुभ प्रसंग से क्या मतलब,वो आपके निजी कार्य मे संगठन की ओर से अर्थ की सहायता क्यो करे जबकि आप सब तरह से सक्षम हो,सम्पन्न हो,ओर भ्रष्टाचार में भी आप कही से पीछे नही हो, तो इस तरह की भीख मांगना कहा तक उचित है।

हां संगठन समय समय पर जो सेवा पानी होती है वो करते है,जो सेवा सहयोग जिम्मेदार द्वारा किया जाता है उसके बदले संगठन समय समय पर मेवा भी प्रस्तुत करते है। लेकिन शुभ प्रसंग में .. लाखो क्यो दे,उसने नही दिये । जिस पर ये खबर पूरी तरह केंद्रित है उसने तो बसूली का रिकार्ड तोड़ रखा है। जानकारों का कहना है 1000₹ भी नही छोड़े जा रहे है..!

जब संगठन से इच्छा पूरी नही हुई तो जो इच्छाधारी नागिन जो इच्छा रख ले पूरी करके ही छोड़ती है,उसी तर्ज पर जब लगा की घी सीधी उंगली से नही निकलेगा तब उसने उसी जगह उंगली टेढी की ओर रातों रात जितनी डिमांड की थी बताते है,तेढी उंगली करने में उसका उतना कार्य हो गया। इसके लिये उसे थोड़ा केवल बहार जाना पड़ा । थोड़ा परिश्रम करना पड़ा,अपनी सीमा से बहार निकलना पड़ा और थोड़े कागजी घोड़े भी दौड़ाने पड़े,बस फिर क्या था,जो चाह वो कार्य हो गया।

ये घुंघरू तो घुंघरू है,ये कभी भी बज सकते है…

इसी तरह की उसकी अवैध बसूली की प्रक्रिया बताते है,आज भी जारी है। निश्चित ये जिम्मेदार जहां जहां अभी तक रहे,सरकार को उन उन सब स्थानों पर आष्टा सहित इनके कार्यकाल की पूरी जांच होना चाहिये ।

अब आप पूछेंगे सरकार को कैसे मालूम होगा कि आखिर ये कौन है.? तो सरकार तो सरकार होती है,उसके पास उसकी कई ऐसी एजेंसियां होती है कि वो ऐसे लोगो का चंद घंटों में इतिहास पटल पर रख सकते है,बस सरकार को उन एजेंसियों को निर्देश भर ही तो देना है…आप भी अंदाजा लगाये..!

ओर अंत मे..

कहते है एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है,जिले का तालाब गंदा हो उसके पहले इस मछली की बिदाई बहुत जरूरी है…..

तो देखा आपने ये है वो घुंघरू जो बजे भी नही ओर सब को सुनाई भी पड़ गये..!

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